Monday, October 13, 2008

धीरेश की पोस्ट पर बहस 4

परेश भाई.. मैं आपसे गुस्सा क्यों होउंगा। मैं कोई थ्योरी नहीं झाड़ रहा.. मैंने आपकी तरह से कोई थ्योरी नहीं पढ़ी है, जिसका मैं हर जगह हर वक़्त इस्तेमाल करता फिरूं। कम्यूनिस्ट की तरह.. कि सब पैबंद एक ही रंग के घागे और एक ही रंग के कपड़े से सिलूं और सिलते वक़्त एक ख़ास रंग का चश्मा पहनूं। जिसे कोई थ्योरी मिल जाती है वो अपने आप को महान समझने लगता है और जिद्दी हो जाता है। उसे लगने लगता है कि वो बाकियों से थोड़ा ऊपर है.. क्योंकि उसके पास एक फार्मूला है। और वो हर जगह हर वक़्त चिल्लाता फिरता है यूरेका... यूरेका... यूरेका..... जैसा कि आपने अपने एक टिपण्णी में कहा था -'भाई कुछ भी कहे लाल झंडे वाले बाकी सबसे नैतिक रूप से एक स्टेप उपर ही होते हैं'-परेश जी सच्चाई ये है कि आप कनफ्यूज्ड हैं। आप अपने सवालों का जवाब तो चाहते ही नहीं और अगर आपको दिखता है तो उसे लाल रंग के चश्में से पढ़ने लग जाते हैं। मैंने कभी नहीं कहा कि नेपाल के माओवादियों को लोगों ने चुनकर नहीं भेजा... मैंने कहा था कि वहां के हिंदू तानाशाह राजा से लोग आजिज आ गए थे और उन्होंने विद्रोही गुट माओवादियों का समर्थन किया। जिसका फायदा उठाकर माओवादी माओ की राह पर चल दिए और हिंसक होते गए.. दस-बारह साल के बच्चों का उनके घरों से अपहरण कर उन्हें क्रांति की आग में झोंका। जिस किसी ने विरोध किया उसको ठिकाने लगा दिया... इसी का विरोध भारत और अमेरिका करते थे। उस हिंसा को आपने नैतिक समर्थन दिया और चीन जैसे मानवता के दुश्मन देश (चीन को कम्यूनिस्ट देश कहने में संकोच होता है क्योंकि उसने 1978 में ही काल मार्क्स के चोले को उतार कर बाजार की अर्थव्यस्था को स्वीकर कर लिया था। अब उस देश में कम्यूनिस्म के नाम पर थियानमेन चौक के प्रदर्शनकारियों पर टैंक चलाना और तिब्बत में प्रदर्शनकारियों की हत्या करना ही रह गया है।) ने आर्थिक और सैनिक मदद की। अब प्रचंड लोकतंत्र के जरिये सत्ता हासिल कर चुके हैं... लेकिन क्या नेपाल में अगला चुनाव होगा या कि वो भी चावेझ, परवेज मुशर्रफ और सद्दाम हुसैन की तरह रिफ्रेंडम कराते रहेंगे और 99.999 प्रतिशत लोगों का समर्थन पाने का दावा करेंगे। जहां तक भारत में लोकतंत्र के नाम पर सत्ता हासिल कर तानाशाह बनने की बात है तो यहां भी नेता करते हैं... वो भी तानशाह बनना चाहते हैं। लेकिन वो लोकतंत्र को तिलांजली नहीं दे सकते क्योंकि इस देश की जनता इसे कभी स्वीकार नहीं करेगी। 15 साल तक लालू ने बिहार पर तानाशाही की लेकिन जनता ने आखिरकार उन्हें उखाड़ फेंका। अटल बिहारी वाजेपेयी की एन-डी-ए सरकार का भी वही हश्र हुआ। गुजरात का दंश बीजेपी की सांप्रदायिक सरकार को ले डूबी। (गुजरात में उस वक्त नरेंद्र मोदी मुख्यमंत्री थे और उन्होंने तीन हजार मुसलमानों का कत्लेआम कराया था और जिसकी वजह से अमेरिका ने अपने देश में उनके घुसने पर बैन लगा रखा है और जिनका चीन के महान कम्यूनिस्टों ने जोरदार स्वागत किया था और तारीफ में कसीदे गढ़े थे) थोड़ा और पीछे जाएं तो राजीव गांधी याद आएंगे जिन्हें जनता ने ऐतिहासिक बहुमत से सरकार बनना के जिम्मा सौंपा था। क्या हुआ आपको अच्छी तरह पता है। उन्हें सत्ता से हटाने के लिए नैतिक से थोड़े ऊंचे लोग पतित संघियों के साथ हो लिए थे। थोड़ा और पहले देखें तो इमरजेंसी याद आती है.. जब इंदिरा गांधी को लगने लगा था कि आई मतलब इंदिरा होता या फिर इंडिया। उन्होंने देश के लोगों का मूल अधिकार छीन लिया था... और जिसका नैतिक रूप से ऊंचे कम्यूनिस्टों ने समर्थन किया था। लेकिन चुनाव में क्या हुआ... ये तो इतिहास बन चुका है। पश्चिम बंगल में कम्यूनिस्टों की तानाशाही तीस सालों से जारी है। सर्वहारा वर्ग की बात करते-करते वहां के कम्यूनिस्ट अमेरिका परस्त हो गए हैं। तीस सालों के बाद उन्हें होश आया है कि चलो अब ऐतिहासिक गलती सुधार ली जाए। अब उन्हें होश आया है सर्वहारा वर्ग का उत्थान खेती कराने से नहीं होगा बल्कि उन्हें मजदूर बनाना होगा। और रात में निकल गए क्रांति के पहरुए अपने नेता के आरमानों को पूरा करने के लिए। जिन गांव के किसानों ने जमीन देने से मना किया था वहां खून की नदियां बहीं और पूरे गांव को लाल (.....) से रंग दिया गया। तब आपके मुख्यमंत्री ने क्या कहा था आपको पता ही होगा ठीक उसी तरह से जैसे गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीन हजार मुसलमानों को मारने के बाद कहा था ये क्रिया की प्रतिक्रिया है। मेरा इतना सब कहने का मतलब ये है कि इस देश में कुछ पार्टियां लोकतंत्र के जरिये सत्ता हासिल कर तानाशाह बनने की कोशिश करती हैं लेकिन वक़्त-वे-वक़्त जनता उन्हें सजा जरूर देती है। देश में लोकतंत्र है इसलिए देश चल रहा है जिस दिन इसे भगवा, लाल या हरे रंग में रंगने की कोशिश की गई उसी दिन बिखर जाएगा। अमेरिका के चाहने से ये न चाहने से।अमेरिका किसी को राष्ट्रपति नहीं चुनता बल्कि वहां के लोग चुनते हैं। चलिये बाराक ओबामा कल को राष्ट्रपति नहीं बन रहें क्योंकि आपके शब्दों में सभी अमेरिकन रेसिस्ट और फासीवादी हैं। लेकिन क्या आपने कभी सुना है किसी अश्वेत अमेरिकी को सर्वहारा क्रांति के वाहक क्यूबा या वेनेजुएला या फिर चीन में शरण लेते हुए। मान लिजिए उसे राजनीतिक शरण की जरूरत नहीं भी हो.. जैसा कि आप कहते हैं कि श्वेतों के सताए अश्वेत अमेरिकन की मदद ह्यूगो चावेझ करते हैं। लेकिन आज तक किसी अश्वेत ने न तो क्यूबा से रोटी मांगी है और न चावेझ से.. मेरा मतलब है अमेरिका से भागकर उन देशों में नहीं गए हैं। कम से कम हमने तो ऐसा नहीं सुना है। हां इतना सुना है कि क्यूबा और वेनेजुएला को एक बड़ी रकम खर्च करनी पड़ती है अपने देश के नागरिकों के देश में बंधक बनाए रखने के लिए। अमेरिका के फ्लोरिडा राज्य से क्यूबा की खाड़ी में हर महीने एकाध नाव दुर्घटनाग्रस्त हो जाती है क्योंकि क्यूबन छुपछुपाकर अमेरिका भागना चाहते हैं। यही हाल वेनेजुएला का है। पता नहीं आपने कहां से पढ़ लिया कि ह्यूगो चावेझ ने अमेरिका के तुफान पीड़ितों की मदद की। शायद आपको पता नहीं हो तो मैं बात दूं कि दुनिया के कुछ देश हैं जिन्हें लगता है कि वो अपने देश में किसी भी विपदा का वो खुद मुकाबला कर सकते हैं और वो बाहरी मदद नहीं लेते उनमें अमेरिका भी शामिल है और चीन भी। और अमेरिका में अश्वेतों पर अत्याचार हुए हैं इसे कोई झुठलाने की कोशिश नहीं करता और उन जख्मों को भरने के लगातार प्रयत्न होते हैं। कोई भी वहां अश्वेतों पर हुए आत्याचारों को "लेकिन" जैसे भारी भरकम शब्द लगाकर उचित नहीं ठहराता जैसे कि आप तिब्बतियों के प्रदर्शन की आजादी पर या तस्मीन नसरीन के देश निकाला पर या उनकी पुस्तक लज्जा पर प्रतिबंध लगाने का समर्थन करने लगते हैं। ठीक उसी तरह से जैसे थियानमैन चौक पर प्रदर्शनाकारियों पर टैंक चलाने का आप तहेदिल से समर्थन करते हैं। मार्टिन लूथर किंग को अमेरिका में संत का दर्जा प्राप्त है जैसे गांधी को भारत में।मेरे भाई आप अमेरिका पुराण बंद क्यों नहीं करते। अमेरिका के चाहने से दुनिया चलती तो फिर कहना ही क्या था। न तो चावेझ होते न कास्त्रो न किम जोंग... दुनिया कितनी अच्छी होती। आप भूल गए हैं कि जब अमेरिका ने वियतनाम में दखलअंदाजी की तो क्या हश्र हुआ था और आज इराक और अफगानिस्तान में क्या हो रहा है। मेरे कहने के मतलब है कि अमेरिका ताकतवर जरूर है लेकिन वो किसी देश के लोगों के आरमानों की कुचलने की ताकत नहीं रखता। वो काम तो सिर्फ आपके गिनाए गए तानाशाह ही रखते हैं जो अमेरिकी नफरत पर सवार होकर देश की जनता के हुक्मरान बने रहते हैं।दुनिया में एक और देश है जिसकी आप कसम खाते होंगे वो है उत्तर कोरिया...। लेकिन आपको पता नहीं होगा क्योंकि आपको एक ख़ास रंग के चश्में से ख़ास फर्म्यूले के तहत चीजों को देखने की आदत है। आपको ऐसा ही सिखाया गया है क्योंकि आपने कहा था कि मैं बचपन से ये बातें सुनता आया हूं। अगर उत्तर कोरियन को मौक़ा मिले तो सभी दक्षिण कोरिया में भाग लें... वहां बचेंगें तो सिर्फ किंम जोंग-II और आप जैसे उनके कर्मठ क्रांतिकारी जो सत्ता की मलाई खाते हैं।आप चीन को तिब्बती आतंकवाद से बचाने का अभियान चला रहे हैं इसलिए तिब्बतियों के शांतिपूर्ण प्रदर्शन में भी आपको गहरी चाल नजर आती है। आपने जोसेफ गोएबल्स का नाम जरूर सुना होगा, वहीं हिटलर का प्रोपोगंडा मशीन.. जिसका कहना था कि किसी झूठ को सौ बार बोलो तो लोग उसे सच मान लेते हैं। लगता है उसकी जिम्मेदारी अब आप लोगों ने उठा ली है। सोवियत लाल सेना भी उसी तरह काबुल में घुसी थी जिस तरह से हंगरी में या फिर पोलैंड में... कि वहां से हमें आमंत्रण मिला है। आपको इस सच का भी पता होना चाहिए कि स्टालिन ने हिटलर से उस वक़्त दोस्ती की थी जब सारी दुनिया मिलकर हिटलरवाद के खात्मे के लिए जुटी हुई थी। स्टालिन उस वक़्त मित्र सेनाओं के साथ हुए जब उन्हें लगा कि अगर उन्होंने मित्र सेनाओं का साथ नहीं दिया तो हिटलर सोवियत संघ पर कब्जा कर लेगा। अगर आप एक ख़ास साइट (जिसका जिक्र आपने अपने पिछले टिपण्णी में की हुई है) और कुछ ख़ास पुस्तकों को छोड़कर बाकी दुनिया की खबरें भी पढ़ते होंगे तो आपको पता होगा कि रशिया ने जार्जिया पर हमला कर दिया है... (वजह में मैं नहीं जाना चाहता) और डरकर पोलैंड और हंगरी मिसाइल डिफेंस सिस्टम बनाने की तैयारी में जुट गए हैं। ये वो देश हैं जो कभी लाल रंग में रंगे हुए थे और आज उन देशों में इसका जिक्र करना भी गुनाह माना जाता है जैसा कि जर्मनी में हिटलर की बात करना।परेश भाई.. काश आप थोड़ा आंसू तस्मीला के लिए बहा लेते.. वो कौन महान कम्यूनिस्ट थे जिन्होंने तस्लीमा पर हमले का विरोध किया था मैं उनका नाम जानना चाहता हूं... जिन्होंने समझदारी भरी भरी बात की फिर भी कम्यूनिस्ट हैं। (सोमनाथ दा ने जिस दिन समझदारी वाली बात की उस दिन उन्होंने अपनी नैतिकता खो दी और जब नैतिक नहीं रहे तो कम्यूनिस्टों ने भी उन्हें अपनी बिरादरी से बाहर कर दिया। सोमनाथ ने तो यहीं कहा था कि वो संघियों के साथ खड़ा होना नहीं दिखना चाहते) जिस दिन तस्लीमा ने कोलकाता छोड़ा था उसके अगले दिन बुद्धदेव भट्टाचार्य सिलीगुड़ी में थे। (मैं मीडिया में काम करता हूं) पीटीआई ने खबर फ्लैश की.. कि बुद्धदेव ने कहा है कि वो तस्लीमा को कोलकाता में रहने देंगे। हमें बहुत खुशी हुई थी कि चलो कोई तो है जो सच्चाई के हक में खड़ा हुआ लेकिन तुरंत खंडन आया कि नहीं बुद्धदेव ने ऐसा कुछ नहीं कहा... सचमुच मन खट्टा हो गया।आपको पूरा हक़ है कि आप अपने विचारों पर कायम रहें... ये हक़ लोकतंत्र देता है.. और आपकी तरह दूसरे रंग के कपड़े पहनने वालों को भी...। लेकिन आपसे विनम्र आग्रह है कि आप दूसरों को भी सुनने की आदत डालें..। मेरी बातें आपको गाली सरीखी लग रही हैं... लग सकती हैं क्योंकि आपको सच सुनने का आदत जो नहीं है। लिखते-लिखते एक मजेदार किस्सा याद आया.. हो सकता है कि ये कोरी बकवास हो.. लेकिन एक समय काफी मशहूर हुई थी। मास्को में एक शख्स आफिस से थकाहारा घर पहुंचा.. उसने टीवी ऑन की... देखा ख्रुश्चेव का भाषण चल रहा है.. दूसरा चैनल बदला वहां भी ख्रुश्चेव ... फिर तीसरा.. चौथा.... पांचवा... हर जगह ख्रुश्चेव .. और आखिरकार उसने रिमोट के आखिरी चैनल पर उंगली रख दी... वहां केजीबी का एक अधिकारी घुरता हुआ मिला... अब बदले तो.... बच्चू...... कुछ समझे ये था ख्रुश्चेव का जलवा। परेश भाई आपको मैंने पूरा पढ़ा... आपकी लेखनी में आपकी तल्खी साफ झलकती है.. आप कहते हैं... "हम जैसे कमीने विधर्मी देशद्रोही गौमांस खाने वाले कम्युनिस्ट जब तक यहा लब की आजादी है तब तक लेनिन स्टालिन अलेन्दे चावेझ फिदेल प्रचंड जिंदाबाद करते रहेंगे"... बिल्कुल करेंगे.. आपको पूरी आजादी है... आप जिंदाबाद कीजिये... मुर्दाबाद किजिये आपको किसने रोका...। अगर किसी ने रोकने की कोशिश की तो हम भी आपके साथ हैं... लेकिन ऐसा दूसरों को भी तो करने दीजिये...। आप लेनिन, स्टालिन के जिंदाबाद के नारे लगा रहे हैं लेकिन उनकी मूर्तियों का उस देश के लोगों ने क्या हश्र किया ये छुपी बात नहीं है... सर्वहारा वर्ग की तानाशाही (तानाशाही को आपने एक नया नाम दिया है) से रशिया आजाद हुआ तो वहां के लोगों को की सालों तक समझ में नहीं आया कि लेनिन की ममी का क्या करें। लेनिनग्राद.. जिस पर आप कभी नाज करते थे आज सेंट्पीटरबर्ग हो गया है... क्यों.. कभी सोचा आपने... शायद नहीं.. कभी फुर्सत में सोचियेगा। आप लेनिन, स्टालिन, चावेझ, कास्त्रो, माओ, किम जोंग-II को महान बताते रहें लेकिन दुनिया का बड़ा हिस्सा उन्हें खलनायक घोषित कर चुका है..। लगता है हमारे बीच तकरार बहुत हो गया... इन बातों का कोई मतलब नहीं है... क्योंकि आप अपना चश्मा नहीं बदलने वाले... चलिये हम भी आपके नारे को दुहराते हैं... और उम्मीद करते हैं इसे आप सिर्फ अपने लिए ही इस्तेमाल नहीं करेंगे इसे आप नंदीग्राम, सिंगूर के लोगों के साथ-साथ तस्लीमा जैसे लोगों को भी इसे दुहराने की आजादी देंगे। --खैर बोल, कि लब आज़ाद हैं तेरे, बोल, ज़बां अब तक तेरी है!'-- लाल सलाम... क्योंकि हमें लाल रंग से कोई परहेज नहीं है बशर्ते हम पर थोपी न जाए...।और आपने जिस साइट को हमें पता दिया था उसे पढ़ा लेकिन इसके प्रोमोटरों के बारे में जानकर सुखद आश्चर्य हुआ कि आप और कुछ तो पढ़ना ही नहीं चाहते है। आपकी जानकारी के लिए ये यहां चिपका रहा हूं प्रोमटरों की जानकारी।"Pragoti (a Sanskrit word meaning Progress) is a website which seeks to create a space for progressive and democratic minded persons who stand for Left and Democratic Alternatives in India and support progressive causes worldwide. Pragoti is dedicated to the task of creating a repository of news, articles and views from a Left perspective on the internet. Besides carrying contemporary, analytical and objective articles, Pragoti also offers a forum to debate, discuss and propagate views from the Left. The Pragoti team comprises of volunteers who share the vision of the Left movement in India."

देवेंद्र वर्मा (20 सितंबर, 2008. 10am)


वर्मा जी नाराज होकर हमें महान वहान की गाली न दे। ये बात जरूर है कि हम बहुत जिद्दी है मरते दम तक लडते रहेंगे। भगत सिंह भी लडता रहा, पाश भी, सफदर भी, फैज अहमद फैज भी, इस लडाई में दुनिया के कई लाखो करोडो लोग आज तक हमारे साथ है, इससे आप इंकार नहीं कर सकते। आपको बताना चाहता हू कि कम्युनिस्टों के बारे में जरा जानकारी एकत्र करके आईये। इमरजेंसी के विरोध में कम्युनिस्ट ने बडी कुर्बानिया दि। मैरे स्वयं के काका दिवगंत का. बालाजी टोकेकर 21 माह मीसा में बंद रहे, कायर आर एस एस वालो की तरह माफीनामें मांग कुछ दिनो में बाहर नही आये। मीसाबंदी के लिये बाटी गयी पैंशन लेने से इन्दौर के ही का. गोयल ने इंकार कर दिया वे भी का. टोकेकर के साथ मीसाबंदी रहे। ये अपवाद नहीं है पूरे भारत में हजारों कम्युनिस्टो को मीसाबंदी बनाया गया कईयो की तो मौते भी हुवी जाकर राष्ट्रीय अभिलेखागार से दस्तावेजो चेक कर आये। आप भी वो ही सभी आरोप दोहराते आये है जो आज तक अंध कम्युनिस्ट विराधी प्रचारक करते रहे है। माफ किजीये आपकी कम्युनिस्टो के बारे जानकारी वाकई बहुत भ्रामक है। कमबख्त ख्रुश्चेव के चुटकुले की बात कर रहें है आप। ये चुटकुला संशोधनवाद के खिलाफ चला था, आपको तो शायद ये भी नहीं पता होगा कि का. स्टालिन को बदनाम करने का उपक्रम इन्ही ख्रुश्चेव महाशय का चलाया था। जब ख्रुश्चेव पश्चिम जाकर स्टालिन को गाली देते फिर रहे थे उस दौर में सी पी सी ने स्टालिन को डिफेंड किया था। कम्युनिस्टो के बारे में कोई भी राय बनाने से पहले उन दस्तावेजो को जरूर पढे। अब ये न कहना कि ये प्रोग्रेसिव या लेफ्टीस्टो के है। आप माकपा के शासन को तानाशाही कह रहे है आप बडे कन्फयुस्ड लगते है मुझे। अब आप ही बता दे दुनिया में तानाशाह कौन नहीं है। एक अंध अमेंरीकी चश्में से देखते हुवे कृपया करके ये मत कहना बुश व आगे चलकर बराक या कोई अमेंरीकी राष्ट्रपति। आप लालू या बंगाल के वाममोर्चा को तानाशाह की गाली देकर देश की संसदीय व्यवस्था संविधान को गाली दे रहे है। किसी को भी तानाशाह कहने से पूर्व 10 बार सोंचे उसके लाखो फालोवर भी होते है, उन्हें आपकी गाली से कितनी ठेस लगती होगी। आप अराजनिती की राजनिती के खोल से एक बार बाहर आकर देखे सब कुछ साफ हो जायेगा। देखिये आपकी आखो पर अमेंरिका का चश्मा लगा हुवा है, उसमें से देखते हुवे आप अपने कल्पनालोक में जी रहें है। आपको पिनोशे नहीं दिखता, अमेंरिका द्वारा बनाया लादेन नहीं दिखता, विएतनाम युद्ध नहीं दिखता, नाकासाकी हिरोशीमा भी नहीं दिखते। अब आप इन सब सचाई पर से मुह मोडकर अमेंरिका द्वारा प्रचारित थ्योरी को ही अंतिम सत्य मानते है तो ठीक है। भाई द्वितीय विश्वयुद्ध का जरा इतिहास पढकर आये फिर का. स्टालिन को गाली दे। ये स्टालिनग्राद की लडाई थी जिसने हिटलर को यूरोप में घुसने से रोका आप लाख कोशिशे कर ले इस सचाई से मुह नहीं मोड सकते। भाई आपका आका अमेंरिका हिटलर को बढने दे रहा था क्योकि यूरोप व अमेंरिका हिटलर व स्टालिन दोनो की मौते चाहते थे। जब हिटलर का पंजा अमेंरिका के गले तक पहुचा तभी अमेंरिका जंग में कूदा। खैर लेनिन स्टालिन की मूर्तिया गिराये जाने का सवाल। का. स्टालिन खुद बहुत ही साधारण व्यक्तित्व व्यक्ति थे वो खुद के महिमामंडन को नापसंद करते थे। उनकी कई मुर्तिया लगवाने की पेशकश से वो आग बबुला हो उठते थे। खैर आपको क्या पडी स्टालिन के बारे में जानने की, आपको तो आपके आका अमेंरिका ने बता रखा है स्टालिन क्रूर तानाशाह था, दरिंदा था। अब अगर विश्वआका ये कहे तो ये ही सही इसकी जाच पडताल क्यो की जाये। अमेंरिकी राष्ट्रपति का निवास कितने कमरो का होता है ये पता लगाये? अरे अमेंरिकी राष्ट्रपति छोडे आपके जिले का कलेक्टर कितने बडे मकान में रहता हो उसे देख आये। आपका क्रूर तानाशाह स्टालिन ताउम्र 3 कमरों के एक फ्लेट में रहता आया। इसी तानाशाह ने एक गरीब पिछडे देश को महज कुछ दशकों में विश्वशक्ति बनवा दिया वो भी प्रत्यक्ष युद्ध झेलने व एक बार पुरा तबाह हो जाने के बाद। अब अगर तानाशाह एसे हो तो हमें तानाशाह व तानाशाही से कोई परहेज नहीं है।क्यूबा के कैदियों पर खर्च होने वाली रकम के बारे में आपने सुना मैंरा आपसे विनम्र आग्रह है कि सुनी सुनाई बातो से निष्कर्ष निकालने के स्थान पर किसी भी सुनी सुनाई बात को तर्क की कसौटी सबूतो द्वारा परखना शुरू करें। खैर मिडीया जगत में सुनी सुनाई बातो का ही ज्यादा महत्व है लेकिन बहस की दुनिया में नहीं।आपने सही कहा "हम जैसे कमीने विधर्मी देशद्रोही गौमांस खाने वाले कम्युनिस्ट जब तक यहा लब की आजादी है तब तक लेनिन स्टालिन अलेन्दे चावेझ फिदेल प्रचंड जिंदाबाद करते रहेंगे"... लेकिन जब ये लब की आजादी छिन ली जायेगी तब हमारे पास भगतसिंह, चे, अलेन्दे, पाब्लो नेरूदा, पाश, सफदर का दिखाया रास्ता भी है।

परेश टोकेकर 'कबीरा ' (20 सितंबर, 2008. 0621 pm)

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