भाई सोतड़ू जी और भाई परेश जी। कौन लोकतांत्रिक है और कौन फास्टिस्ट ये तय करना आसान नहीं। जहां व्यक्ति की स्वतंत्रता की बात है उस मामले में.. मैं अमेरिका को हमेशा चीन जैसे देशों से ऊपर रखूंगा। भारत के कम्यूनिस्ट बंधुओं ने अमेरिकी राष्ट्रपति बुश को भारत के पार्लियामेंट में नहीं बोलने दिया था। बाद में इस मुद्दे पर मैंने मशहूर लेखिका अरुंधंती राय की एक टिपण्णी पढ़ी जिसे उन्होंने अमेरिका में व्हाइट हाउस के बगल में आयोजित एक सेमिनार में बोला था। उन्होंने कहा था कि देखो हमने बुश मजबूर कर दिया कि उसे चिड़ियाघर में जानवरों को संबोधित करना पड़ा..। उनकी ये टिप्पणी शायद ही मैं कभी भूल पाउं... यहीं बात अगर चीन के राष्ट्रपति के साथ हुई होती तो क्या अरुंधति राय बीजिंग में ऐसी बातें बोलने की हिम्मत कर पातीं... यहीं अमेरिकी लोकतंत्र की ताकत है.. वो अपने विरोधियों को बर्दाश्त करना जानता है.. उसे इसकी आदत में शामिल है। दुनिया में अमेरिका ही एकमात्र ऐसा देश है जिसने नरेंद्र मोदी को अपने आने का वीजा नहीं दिया। ऐसा एक बार नहीं हुआ बल्कि मेरी जानकारी में दो बार हो चुका है... अगर आपको जानकारी हो तो बता दूं कि इस बीच नरेंद्र मोदी चीन से हो आए हैं और उनका वहां पर जोरदार स्वागत भी हुआ।
परेश जी आप जिन दक्षिण अमेरिकी देशों में क्रांति को कुचलने की बात करते हैं.. ये उन तानाशाहों की क्रांतियां होती है जिन्हें सिर्फ एक क्रांति पसंद है... एक बार सत्ता पर काबिज हो जाने के बाद दूसरी क्रांति बर्दाश्त नहीं करते। जब ऐसे क्रांतियों की बात आती है तो याद आता है क्यूबा जहां फिदेल क्रास्तो ने क्रांति की अलख जगाई और जब वो क्रांति का बोझ उठाने से चुकने लगे तो अपने भाई को क्रांति की मशाल सौंप दी। आप चिली की बात करते हैं... अलसल्वाडोर की बात करते हैं.. वेनेजुएला की बात करते हैं... लेकिन अमेरिका की छाती पर बैठे क्यूबा को भूल जाते हैं... आपके मुताबिक अमेरिका ने सभी जगह सफलता पा ली लेकिन क्यूबा में चूक गया.. क्यों.. ये बात मेरी समझ से परे है... अमेरिका क्यूबा में सफल क्यों नहीं हो पाया... क्या चिली और अल-सल्वाडोर के क्रांतिकारियों से कास्त्रो के सैनिक ज्यादा जांबाज थे.. चिली और अल-सल्वाडोर की क्रांतियो को तो अमेरिका ने कुचल दिया लेकिन वो क्यूबा में असफल क्यों हो गया..। वेनेजुएला में लाल सलाम झंडे बुलंद कर रहा है.. और शायद आप भी जश्न मना रहे होंगे.. लेकिन क्या पांच साल बाद ये छे साल बाद वहां क्रांति होगी मेरा मतलब है चुनाव से है... मुझे लगता है कि उस वक्त ह्यूगो चावेज अमेरिका का हौवा खड़ा करेंगे और आप उनके सुर में सुर मिलना कि वेनेजुएला के तेल भंडार पर अमेरिका कब्जा कर लेगा... तब आप जैसे लोग मान लेंगे कि वेनेजुएला के लोगों को अमेरिकी साम्राज्यवाद से बचाने के लिए चुनाव की जरूरत नहीं है.. क्योंकि अमेरिका लोगों को बहला-फुसला कर अपने समर्थन के नेता को वोट दिलवा देगा...। यानी क्रांति के नाम पर लोगों के बुनियादी हक पर कब्जा करना कम्यूनिस्म का बेसिक फंडा है...। यहीं बात संघ जैसे संगठनों पर भी लागू होती है क्योंकि उनके आदर्श हिटलर जैसे शख्स होते हैं...।
जहां तक भारत की बात है हर बात पर लाल झंडा उठा लेने वाले कम्यूनिस्टों ने कोलकाता यानी पश्चिम बंगाल में तिब्बतियों को प्रदर्शन नहीं करने दिया था... एम एफ हुसैन के लिए बैंटिंग करने वालों ने तस्लीमा नसरीन को कैसे देश निकाला दिया और सफदर हासमी की कसम खाने वालों ने दुनिया में सबसे पहले भारत में सलमान रुश्दी की किताब सेटानिक वर्सेज पर कैसे प्रतिबंध लगवाया था.. इसे भूलना आसान नहीं। एम एफ हुसैन का विरोध संघ और बजरंग दल जैसे संगठनों को छोड़कर शायद ही कोई करता होगा,,, लेकिन मेरी जिस किसी भी कम्यनिस्ट विचारधारा के व्यक्ति से बात होती है वो तस्लमी नसरीन को सही ठहराने के पहले 'लेकिन' शब्द जरूर लगाता है और वो 'लेकिन' इतना वजनी होता है कि उसकी सारी बातें उसी 'लेकिन' के भीतर दब जाती हैं...। अगर आप इन शब्दों को पढ़ने का कष्ट करेंगे तो पक्का भरोसा है कि आप भी मुझे संघ के झोली में डाल देंगे..। लेकिन मेरा भरोसा किजिये मुझे हर उस चीज से नफरत है जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और व्यक्ति की आजादी पर प्रतिबंध लगाती है... चाहे वो कम्यूनिज्म हो या फिर साम्राज्यवाद...। धन्यवाद....।
देवेंद्र वर्मा (16 सितंबर, 2008. 1229am)
देवेंद्र वर्मा जी, हिन्दी चिट्ठाजगत में शानदार बोहनी के लिये बहुत-बहुत बधाई।देवेंद्र जी आपके तर्क से 100 फिसद सहमत बशर्ते आप 'तानाशाहों की क्रांतिया' संज्ञा को 'सर्वहारा की तानाशाही के लिये क्रांतिया' से तब्दील कर दे! इतिहास पर दृष्टी डाले तो सामंतवाद को ओद्योगिक क्रांति की देन उत्पादन के स्वामी अर्थात बुर्जुआ वर्ग की तानाशाही की क्रांति ने प्रतिस्थापित किया। इसी वर्ग ने पुरानी व्यवस्था को इतिहास के कूडेदान में डालकर नयी व्यवस्था का आगाज किया। पूंजीवादी व्यवस्था अपने अंतद्वंदो से स्वयं बिखरी व आज तक बिखर रही है वापस संभल भी रही है लेकिन उसका पराभव अवश्यंभावी हैं (एनरान घपले के बाद व कल अमेंरिकी आर्थिक जगत में क्या हुवा पढीये अखबारों में)। सर्वहारा अपनी मुक्ती के लिये इस सडी गली व्यवस्था को 'सर्वहारा की तानाशाही' से प्रतिस्थापित कर रहा है। इस प्रक्रिया की शुरूवात सोवियत संघ की सफल क्रांति के दौर से शुरू हो चुकी है, अपनी तमाम असफलता के बावजुद यह प्रक्रिया बदस्तुर जारी है। साहब इतिहास कोई 20-20 नहीं है यह टेस्ट मैंच की भांति बहुत धीरे धीरे करवट बदलता है, लैटिन अमेंरिका में फिदेल-चे के छोटे से क्यूबा ने क्रांति की जा अलख जगाई उसके परिणाम पिछले दशक में स्पष्ट दिखने लगे। ब्राजील, वेनेझुएला, अर्जेटीना, चीली, बोलिवीया, निकारागुआ, उरग्वे, पेराग्वे, इक्वाडोर जैसे लैटिन अमेंरीकी देश जिस बदलाव के दौर से गुजर रहे है उसे 'तानाशाहों की क्रांति' शब्द के कलेवर में लपेटकर यू ही आसानी से नजरअंदाज नहीं कर सकते है। लूला डिसल्वा, मिशेल बचलेट, क्रिस्टीना किरशनेर, ईवो, चावेझ, लूगो इत्यादी आधा दर्जन शासनाध्यक्षो को आसानी से तानाशाह सिद्ध नहीं कर सकते है, ये सभी संसदीय प्रणाली के तहत जनता द्वारा चुने गये है। चावेज व ईवो को जीतने से रोकने के लिये अमेंरिकी प्रशासन ने आर्थित नाकेबंदी से लेकर सैन्य हस्तक्षेप किये जाने जैसी धमकीया तक इन देशो की जनता को दी, इन जनप्रिय वामपंथी नेताओ को हराने के बदले डालरों की नदीया इन देशों में बहा देने का प्रलोभन भी दिया गया, वक्तव्य उपलब्ध है कभी ढुंढकर पढने का कष्ट जरूर किजीये। वेनेझुएला में तो बकायदा अमेंरीकी शह पर तख्तापलट का प्रयास किया गया जो असफल हो गया। अब वैसे ही प्रयास की पुनरावृत्ति बोलिविया में की जा रही है। आप 25 मार्च 1970 को व्हाईट हाउस में हुवी 'कमेटी आफ 40' की हेनरी किंसीगर के अध्यक्षता में हुवी मिंटीग को क्यो भुल जाते है, जिसने 'स्पाईलिंग आपरेशन' के तहत अलेंन्दे को चुनावो में जीतने से रोकने के लिये, चुनाव जीत जाने की स्थिती में सैन्य तख्तापलट द्वारा अपदस्त करने के लिये $125000 अनुमोदित किये थे। किंसीगर के एक अन्य कुख्यात बयान पर जरा गौर फरमाईये जिसमें वे कहते है - "मुझे समझ नहीं आता हम क्यो हाथ पर हाथ धरे बैठकर एक देश का उसकी जनता के गैरजिम्मेदाराना रवैये के चलते कम्युनिस्ट होता देखे।" कांट्रा विद्रोहीयो के दानव को किसने खडा किया। राईस की इराक में बच्चो के मरने को जस्टीफाई करने वाला बयान लब की आजादी का ही उपादान है। आप विएतनाम के बारे में नहीं जानते है क्या?फिदेल की बिमारी के समय भी अमेंरिका अपने अनैतिक कुटिल व्यवहार से बाज नहीं आया, उन्होंने फिदेल को मरता समझ वहा तख्तापलट के लिये विद्रोहीयो को खुलेआम समर्थन भी देना शुरू कर दिया, यही है लब की स्वतंत्रता। बहरहाल ये तो आप भी जानते है कि एक तानाशाह यू ही आसानी से सत्ता नहीं छोडता है, तो फिदेल ने कैसे छोड दि, इस प्रश्न का कोई जवाब है आपके पास? अब कृपया करके ये न कहे भाई भतीजावाद है वहा, अपनी गद्दी अपने भाई को दि। शर्मा जी आपके इस प्रश्न का जवाब एडवांस में ही दे रहा हू - राउल की क्यूबन क्रांति व उसके बाद क्यूबा बनने की प्रक्रिया में जो भूमिका रही है उसे जानने वाला कोई भी व्यक्ति शायद ये आरोप लगा सके। उनके धुर विरोधी भी ये आरोप लगाने का दु:साहस नहीं कर पाये है। बहरहाल रहा सवाल 'क्रांति का बोझ न उठा सकने' का तो हम ज्योती दा या फिदेल को मिथकीय चरित्र भीष्म पितामह, अश्वथामा या हनुमान नहीं मानते है जो अमर है। हम वैज्ञानिक सोच वाले लोग है हमारे लिये वो एक इंसान है, ढलती उम्र के चलते हुवे उन्हें सर्वहारा की सत्ता या आपके शब्दो में कह ले तानाशाही के नेता के रूप में अपनी जिम्मेदारीया किसी अन्य को कभी न कभी तो देनी ही थी। इसमें अव्यवाहारिक या अपने कर्तव्यो से भागने जैसा क्या है? खैर आपके 'क्रांति का बोझ न उठा सकने' के कुतर्को को खारीज करते हुवे फिदेल अपने जीते जी बोलीवरीयन क्रांति को सफल होते देख रहें है। क्रांति के नाम पर लोगों के बुनियादी हक पर कब्जा करने का सरलीकृत आरोप तो आपने मढ दिया हमें एसे आरोंपो से कोई हैरत भी नहीं होती है। यह स्वाभाविक ही है अब आपको दुनियाभर के गरीबो की देखरेख करते क्यूबा के डाक्टर क्यो दिखाई देने लगे? सोवियत्स की मदत को छोडे, लैटिन अमेंरिका के गरीबो की क्यूबा व वेनेझुएला ने जो मदत की उससे आपका-हमारा क्या सरोकार? आपने सही कहा हमारे देश के अल्पसंख्यक उच्च-उच्च मध्यमवर्ग उनके अमेंरीकी-इंडियन एन आर आई रिश्तेदारो के मादरेवतन अमेंरीका में लब की बडी आजादी है, आप कही पर भी कुछ भी कह सकते है। पर नक्कारखाने में तूती बजाने का मतलब नहीं जानते क्या आप? तूती तो आज दुनियाभर में मादरेवतन के संघियो अर्थात नियोकान्स व उनके खैरख्वाह झायनवादीयो की ही बोलती है। इन अमेंरिकी संघीयो की चले तो अमेंरिका में एक भी अश्वेत जिंदा न बच पाये, इन्हीं के कारण अमेंरिका की सभी समस्याये है। गरीब अश्वेत आबादी को कडे ठंड के दिनो में सस्ता ईधन मुहैया करवाने की अमेंरिका में कोई व्यवस्था हैं, अब कोई कितना भी चिल्लाये उसे लब की पुरी आजादी है चिल्लाता रहें चिल्ला चिल्ला कर बोल बोल कर ही अपनी ठंड से निजात पाये। उधर आपके तानाशाह चावेझ का वेनेझुएला अपने शत्रु देश के इन गरीबो को ठंड से निजात दिलाने के विशेष सस्ता ईधन उपलब्ध करवाता है वो भी बिना कुछ बोले। तिब्बत चीन व भारत के इतिहास के बाद कुछ पढ लिख लिजीये फिर तिब्बत की आजादी का झंडा बुलंद करे। साहब आपके परमपुज्य दलाईलामा तक तिब्बत की आजादी की बात नहीं करते वे तो सिर्फ स्वयत्ता चाहते है, तो आप काहे बोम मारते फिर रहे हो। पहले अपने पैबंद ठीक कर ले फिर दुसरे के फटे में टांग डालने पहुचिये। वर्मा जी माफ किजीये आपके प्रश्नो के जवाब देते देते टिप्पणी थोडी बडी हो गयी।
परेश टोकेकर 'कबीरा ' (16 सितंबर, 2008. 1017pm)
No comments:
Post a Comment