भाई परेश टोकेकर जी, सबसे पहले मैं आपसे माफी मांग लूं कि मेरी कोई बात आपको बुरी लग गई है। वैसे खुद आपने ही अपने आप को महान बताया था- "भाई कुछ भी कहें लाल झंडे वाले बाकी सबसे नैतिक रूप से एक स्टेप उपर ही होते हैं।" परेश भाई मैं सबसे पहले आपको स्पष्ट कर दूं कि मेरे विचार क्या हैं। मैं कोई झंडा उठाकर नहीं चलता है इसलिए मैं हर उस व्यक्ति का समर्थन करता हूं जो लोकतांत्रिक मूल्य और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए लड़ाई लड़ता है। आप विश्वास किजिये मैं बिल्कुल कन्फ्यूज्ड नहीं हूं। मुझे इस देश पर इसलिए भरोसा है कि यहां लोकतंत्र है। इसी वजह से तमाम कमियों के बावजूद देश बेहतर भविष्य की ओर अग्रसर है। अगर इस देश का लोकतंत्र और यहां की लोकतांत्रिक संस्थाएं मजबूत होती रहीं और हम इसमें योगदान देते रहे तो मुझे लगता है कि आने वाली पीढ़ी के लिए ये हम सबकी तरफ से तोहफा होगा।परेश भाई अपने अपनी टिपण्णी में लिखा है कि मैंने लालू, मोदी वगैरा... वगैरा को तानाशाह कहा। पता नहीं आप मेरी बात नहीं समझ पा रहे या नहीं समझने का ढोंग कर रहे हैं। आपको एक बार फिर स्पष्ट कर दूं कि लोकतंत्र में जिसे भी लगता है कि वो सर्वोसर्वा और महान हो गया है जनता उसे धूल चटा देती है... क्योंकि इसमें लोगों को चुनने का अधिकार होता है। मैंने कहा था कि एन-डी-ए की सरकार को लगने लगा था कि उसने देश को बदल दिया है... लेकिन वोटरों ने क्या किया उसे ही बदल दिया यानी लोकतंत्र में कोई तानाशाह या सर्वोसर्वा हो ही नहीं सकता। परेश जी.. अब मैं जो कहने जा रहा हूं हो सकता है आपको बुरा लग जाए... लेकिन हकीकत यही है। आप या तो कन्फ्यूज्ड हैं या फिर डबल स्टैंडर्ड व्यक्ति हैं। आप सफदर हासमी के लिए तो नारेबाजी करते हैं लेकिन तसलीमा को देश निकाला देने में आपको कोई हर्ज नहीं। आप मकबूल फिदा हुसैन के लिए झंडा बुलंद करते हैं लेकिन सेटानिक वर्सेज किताब पर प्रतिबंध लगाने का आप बेहिचक समर्थन करते हैं। गुजरात दंगों पर आधारित फिल्म "परज़ानिया" के आप गुण गाते फिरते हैं लेकिन फिल्म "Da Vinci Code" पर प्रतिबंध लगाने में आपको शर्म नहीं आती। फेरहिस्त लंबी है... क्या-क्या गिनाउं। मैं ऐसा दोहरा मानदंड नहीं रखता... न ही कोई चश्मा पहनकर चीजों को देखता हूं। मेरा मानना है कि इस देश में सभी को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता होनी चाहिए। आपको तय करना है आप कनफ्यूज्ड हैं या फिर डबल स्टैंडर्ड व्यक्ति।
आप कहते हैं कि मैं देश की संसदीय लोकतंत्र को गाली दे रहा हूं... ऐसा नहीं है। आप तो एक और संसदीय लोकतंत्र (सिर्फ आपने अपने पिछले टिपण्णी में इसे अच्छा बताया) की दुहाई देते हैं दूसरी ओर इसे ख़त्म करने की कसम खाए बैठे नक्सलियों का नैतिक समर्थन (आप ही शब्दों में "भाई कुछ भी कहें लाल झंडे वाले बाकी सबसे नैतिक रूप से एक स्टेप उपर ही होते हैं।") करते हैं। भाई सचमुच आपको पता ही नहीं कि आप चाहते क्या हैं। मुझे अमेरिका ने कुछ नहीं सिखाया है क्योंकि उसकी जरूरत ही नहीं पड़ी... जब मैं समझदार हुआ तब तक रशिया के लोग आजाद हो गए थे... आपके महान कॉमरेड स्टालिन की कहानियां दुनिया को सुनाने के लिए। मैं जब समझदार हुआ उस वक़्त बर्लिन की दीवार गिर गई थी। दीवार फांदने वालों का क्या हश्र होता था... और जो भागने में सफल हो जाते थे उनके मां-बाप और रिश्तेदारों के साथ क्या सलूक हुआ था वो उसे बताने के लिए लोग मौजूद थे। क्यूबा से भागकर अमेरिका आने वालों की बात का आप भरोसा नहीं करेंगे। (आपको शब्दों में क्योंकि ये सर्वहारा क्रांति को बदमान करने की अमेरिकी साजिश है)। लेकिन उस दिन का हम इंतजार करेंगे कि क्यूबन को भी सोचने की आजादी मिले जैसे मुझे और आपको मिली हुई है। मुझे लगता है कि क्यूबा के लोग क्यूबा की खतरनाक खाड़ी को पार कर अमेरिका आते हैं ये हकीकत है.. सुनी-सुनाई बात नहीं है।
आपको तानाशाही से कोई परहेज नहीं है... लेकिन मुझे है... क्योंकि मैं उससे सवाल पुंछूंगा। वो रिफ्रेंडम कराएगा और मैं उसपर सवाल उठाउंगा ऐसे में मेरा क्या होगा... सोचकर रूह कांप जाती है। आपको थियानमेन चौक पर बच्चों के ऊपर टैंक चलाना अच्छा लगता होगा.. लेकिन मैं नहीं चाहूंगा कि कम्यूनिस्ट परमाणु करार का विरोध करने वोट क्लब पर इकट्ठा हों और मनमोहन सिंह टैंक चलवा दें.. सोचकर देखिये... तब आपको अहसास हो कि तानाशाही क्या होती है। हिटलर, किम जोंग किंग, कास्त्रो, ह्यूगो चावेझ, पिनोशे, हिटलर की तानशाही को सही ठहराना छोड़ दें। बहुत दूर की बात नहीं जब पड़ोसी देश म्यामां में बौद्ध भिक्षुओं ने प्रदर्शन किया और उनपर हैलिकप्टर से गोलियां बरसाई गईं थीं तब आपको कैसा महसूस हुआ था... बताइगा जरूर। हो सकता है कि आपको अच्छी लगी होगी क्योंकि आप शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वालों को आतंकवादी कहते हैं जैसा कि आपने तिब्बतियों का बारे में कहा था और म्यांमा की जुन्टा को भी तो चीन का भरपूर समर्थन प्राप्त है ऐसे में आपका समर्थन भी तो जुन्टा के साथ ही होगा।)
चलिये एक बार मान लेते हैं कि चीली की सच्चा पर पिनोशे को अमेरिका ने बिठाया लेकिन उस तानाशाह का हश्र क्या हुआ आपको पता है...। (मुझे लगता है कि आप इतिहास ही लाल चश्मा लगाकर ही पढ़ते हैं।) पाल्बो नेरूदा महान कवि थे इससे कौन इनकार करता है... उनकी महान रचनाओं के लिए उन्हें नोबेल प्राइज से नवाजा गया था। उन्हें मार्केज़ ने सदी के सबसे महान कवि की उपाधि दी थी। दुनिया के जितने भी लिबरल लोग हैं (सिर्फ लेफ्टिस्ट लिबरल नहीं) उनका सम्मान करते हैं। मैं चाहूंगा कि आपको इतिहास की एक झलक दिखाता चलूं। आपसे आग्रह है कि कृपया इसे लाल चश्मा लगाकर मत पढ़ियेगा। सेकेंड वर्ल्ड वार के दौरान नेरूदा ने स्टालिन के बड़े समर्थक थे। हिटलर को परास्त करने की वजह से नेरूदा ने स्टालिन की काफी तारीफ की थी। 1953 में उन्हें स्टालिन शांति पुरस्कार से नवाजा गया। उसी साल स्टालिन की मौत हो गई थी। उसके बाद नेरूदा ने स्टालिन के गुणगान करते हुए गीत भी लिखे। आपको पता है नेरूदा के स्टालिनिस्ट होने पर उनके लंबे समय के दोस्त रहे ओक्टावियो पाज़ (पाज़ के बारे में मुझसे ज्यादा आप जानते होंगे) ने क्या कहा था। पाज़ के शब्दों में- "नेरूदा दिनोंदिन स्टालिनिस्ट होते जा रहे हैं जबकि मेरा स्टालिनवाद से मोहभंग होता जा रहा है।" पाज़ और नेरूदा के बीच वैचारिक मतभेद 1939 में शुरू हो गए थे, जब स्टालिन-हिटलर समझौता हुआ। (कुछ लोग इसे मोलोटोव-रिबेनट्रोप पैक्ट तो कुछ नाजी-सोवियत पैक्ट तो कुछ इसे नाजी-सोवियत गठबंधन कहते हैं।) 24 अगस्त 1939 को मास्को में सोवियत विदेश मंत्री व्यास्चेस्वाव मोलोटोव और जर्मन विदेश मंत्री रीबिनट्रोप ने समझौते पर हस्ताक्षर किये। इसके तहत दोनों देश एक-दूसरे का ख्याल रखने का संकल्प लिया था और कहा था कि दोनों देशों में से कोई एक किसी तीसरे देश पर आक्रमण करता है तो दूसरा हस्तक्षेप नहीं करेगा। लेकिन हिटलर तो हिटलर था जिसके लिए समझौते कोई मायने नहीं रखते थे और उसे लगा कि वो सोवियत संघ को जीत लेगा तो उसने आक्रमण कर दिया। फिर कैसे स्टालिन मित्र राष्ट्रों के खेमें शामिल हुए ये हर कोई जानता है।
हां तो मैं बात कर रहा था पाल्बो नेरूदा और ओक्टाविया पाज़ की दोस्ती की। नेरूदा के स्टालिनिस्ट रूझाने के बावजूद पाज़ उन्हें एक महान कवि मानते थे। पाज़ ने एक आर्टिकल में लिखा था- " नेरूदा और दूसरे मशहूर स्टालिनिस्ट लेखकों को पढ़ता हूं तो अजीब सा महसूस होता है। इसमें कोई शक नहीं कि वो अच्छी सोच के साथ शुरुआत करते हैं लेकिन जल्द ही अपनी अंतरात्मा की आवाज को भूलकर प्रतिबद्धता के चक्कर में खुद को झूठ, झूठे साक्ष्यों और बेहूदा तर्कों के जाल फंसा लेते हैं।" तमाम विरोधों के बावजूद नेरूदा स्टालिन को सही ठहराते रहे। लेकिन 1957 में चीन दौरे के बाद की लिखी नेरूदा की टिपण्णियों को आपने नहीं पढ़ा है। उसे जरूर पढ़ियेगा.. कि कैसे उनका स्टालिनवाद से मोहभंग हुआ और माओ के सर्वहारा क्रांति के बारे में उनकी क्या टिपण्णी है। इस डर से कि उनके वैचारिक दुश्मनों को उनपर हमला करने का मौका न मिले शायद उन्होंने बोरिस पेस्टनॉक और जोसेफ ब्रोडस्की के सोवियत संघ में हुए उत्पीड़न का विरोध नहीं किया। मैं नेरूदा की आलोचना नहीं कर रहा... सच तो ये है कि मेरी कोई वकत नहीं कि मैं नेरूदा जैसे महान लेखक के बारे में बोलूं। लेकिन लोकतंत्र सिखाता है कि किसी को महान मानने के पहले सवाल जरूर पूछो। मुझे लगता है कि आप इसका बुरा नहीं मानेंगे ये बात कहके कि आप सवाल उठाने वाले कौन होते हैं। और आपको पता ही होगा कि 'ओक्टावियो पाज़' ने कैसे खुद को बदला। क्रांतिकारी पाज़ बाद में खुद को लेफ्टिस्ट लिबरल मानने लगे थे और उन्हें हठी और अनुदार कम्यूनिस्टों के चिढ़ हो गई थी।
जहां तक चीली की बात है 1970 में वहां चुनाव हुए उसमें सल्वाडोर अलेंदे की पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, लेकिन पूर्ण बहुमत नहीं होने की वजह नेशनल कांग्रेस ऑफ चीली में वोटिंग हुई। कांग्रेस ने अलेंदे और अलेसांद्री में से अलेंदे को राष्ट्ररपति चुन लिया। उसके पहले क्या खेल हुए थोड़ा बता दूं। कहा जाता कि अलेसांद्री के लिए सीआईए और अलेंदे के लिए केजीबी ने लाखों डॉलर खर्च किये थे। (सीआईए और केजीबी दोनों ने इससे इनकार किया था) अलेंदे राष्ट्रपति बन गए। आप कहते हैं कि अमेरिका ने अलेंदे का तख्ता पलटा... चलिये मान लेते हैं.. लेकिन आपको पता है 1973 में चीली की हालत क्या थी। अलेंदे की आर्थिक नीतियों की वजह से देश की अर्थव्यवस्था गर्त में चली गई थी। मुझे एक साइट से आकड़ा मिला है कि उस वक़्त चीली में मुद्रास्फीति की सलाना दर 508% थी। भारत में मुद्रास्फीति की दर बारह प्रतिशत होने पर इतना हायतौबा मच रहा है और लग रहा है कि मनमोहन सरकार अगला चुनाव हार सकती है। अंदाजा लगाए चीली की जनता पर उस वक़्त क्या गुजर रहा होगा।मैं आपको पिछली तीन टिपण्णियों में समझाने की कोशिश कर रहा हूं कि अमेरिका के चाहने भर से कुछ नहीं हो सकता। अगर होना होता तो 1970 में अलेंदे कांग्रेस में चुनाव हार जाते। अमेरिका ने पिनोशे को समर्थन दिया होगा लेकिन तख्ता पलट के लिए अमेरिका से ज्यादा अलेंदे और उनकी आर्थिक नीतियां जिम्मेदार थीं। जब नेरूदा की मौत हुई तो पिनोशे की मजबूत तानाशाही के दौर में कर्फ्यू का उल्लंघन कर चीलीयन्स अपने महान कवि को श्रद्धांजलि देने सड़कों पर उतर आए थे। फिर पिनोशे का क्या हुआ... आपको अगर पता न हो तो मैं बता दूं कि 1988 में वो इलाज कराने ब्रिटेन गया तो वहां उसे गिरफ्तार कर लिया गया। 2002 तक ब्रिटेन में नजरबंद रहा। उसे हेल्थ ग्राउंड पर छोड़ा गया और जब उसकी मौत हुई तो एक चिलियन्स ने अपने पूर्व राष्ट्रपति को राजकीय सम्मान भी देने से मना कर दिया।इतना सब कहने का मतलब है कि आप चश्मा पहने लेकिन कभी-कभी उतार कर भी दुनियां देखें। दुनिया हसीन है... लोकतांत्रिक समाज और देश अपने चीजों को अंदर ही अंदर दुरुस्त कर लेता है।
हे स्टालिन भक्त भाई परेश... रशियन लोगों ने तो आजाद होने का भी इंतजार नहीं किया स्टालिन के पापों को दुनिया के सामने लाने के लिए। 1956 में हुए कम्यूनिस्ट पार्टी के बीसवें कांग्रेस अधिवेशन में निकिता ख्रुश्चेव का सेक्रेट स्पीच पढ़ा होगा। कैसे ख्रुश्चेव ने स्टालिन के किये पापों के लिए माफी मांगी थी।
दरअसल मैं अमेरिका की इसलिए पैरवी करता हूं कि वहां लोकतंत्र है और लिबरल समाज है। इराक युद्ध के खिलाफ जितनी बड़ी रैली न्यूयार्क में निकली थी जिसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते। काश आप लोग भगत सिंह, चे, अलेन्दे, पाब्लो नेरूदा, पाश, सफद के बताए कदमों पर चलते हुए दुनिया को बदलने के लिए संघर्ष करते... लेकिन ऐसा नहीं हो रहा। क्या आपको लगता है कि भगत सिंह तस्लीमा नसरीन को देश से निकालने और उनकी पुस्तक पर प्रतिबंध लगाने का समर्थन करते... पाश भी ऐसा नहीं करते और सफदर भी नहीं...। लेकिन इन सबका कसम खाने वालों दुनिया बहुत बड़ी है। दुनिया टेढ़ी होकर नहीं चलती। आपको लगता है कि दुनिया लेफ्ट की तरफ झुकी हुई है और संघियों को लगता है कि राइट की तरफ। लेकिन अगर आप सीधा देखें तो दुनिया सीधी है और ऐसा मानने वालों की तदाद सबसे ज्यादा है तभी देश में लोकतंत्र है। अगर ऐसा नहीं होता तो देश में या तो नक्सल होते या फिर फिरका पसंद ताकतें। लगता है मैंने आज कुछ ज्यादा ही लिख दिया... लेकिन मेरी बातों पर गौर जरूर किजियेगा।
देवेंद्र वर्मा (23 सितंबर, 2008. 0403 pm)
बहस में पड़ने का मेरा कोई इरादा नहीं है। सोतड़ू ने कहा तो मैं पढ़ने आ गया। फिर भी दो बातें कहने के लिये रुक रहा हूँ।जहां लोगों में अपना बोझ उठाकर चलने की कुव्वत नहीं है वहां किसी भी रंग का झंडा उठाकर चलने की बात करना साफतौर पर अय्याशी है और यह अय्याशी वही कर सकते हैं जिनके पेट भरे हों, फिर चाहे वे बाईं ओर चलने वाले हों या दाईं ओर चलने वाले। सीधा चलना हमेशा आसान होता है। कभी सिर आसमान की ओर उठाकर चलने की कोशिश कीजियेगा। अपने आप या तो आप दाएं हो जाएंगे या बाएं। झंडाबरदारों के साथ भी मुझे ऐसा ही लगता है।खैर मैं तो टिप्पणियां पढ़ने की प्रक्रिया में उठी एक-आध बात कहने के लिये रुका था। देवेन्द्र जी ने पूर्वी जर्मनी की कहीं बात छेड़ी थी। अगर परेश जी को मालूम हो पूर्वी जर्मनी के पश्चिमी जर्मनी में विलय के बाद (यह पूर्वी जर्मनी का पश्चिमी जर्मनी में विलय ही था, दो देशों का एक दूसरे में नहीं क्योंकि पूर्वी जर्मनी का बोझ पश्चिमी जर्मनी के सिर ही पड़ा) जर्मनी में नियो-नाज़िस्म की लहर सी चल पड़ी है। विदेशियों पर (काले, भूरे, पीले लोग) वहां जबतब आक्रमण होते रहते हैं हालांकि उनकी संख्या और आकार दोनों ही फिलहाल नगण्य हैं। मज़ेदार बात यह है कि ये आक्रमण हमेशा जर्मनी के उस हिस्से में हुए हैं जो कभी पूर्वी जर्मनी कहलाता था। दूसरी बात कि उस हिस्से के लोगों को पश्चिमी जर्मनी की कार्य-संस्कृति के अनुकूल नहीं माना जाता क्योंकि उनकी कार्य-शैली हमारे सरकारी बाबूओं से कुछ जुदा नहीं है। ये दोनों क्या कम्यूनिज़्म की ही देन नहीं है?
महेन (24 सितंबर, 0845 pm)
No comments:
Post a Comment