Monday, October 13, 2008

धीरेश की पोस्ट पर बहस 3

परेश टोकेकर जी... सच्ची बातें कड़वी लगती है.. सो आपको लगी इसमें मेरी कोई लगती नहीं है... माफ किजियेगा। लाल झंडा थामे हुए दुनिया की हर समस्या के लिए अमेरिका को कोसना तो कम्यूनिज्म का शगल है। आप जिन लैटिन अमेरिकी देशों की बात कर रहे हैं.. वहां के तानाशाह लोकतंत्र के जरिये ही सत्ता पर काबिज हुए हैं। ठीक उसी तरह से जैसे अमेरिका में या फिर भारत में कोई पार्टी सत्ता संभालती है। ह्यूगो चावेझ हो या फिर कोई और लैटिन अमेरिकी देश के तानाशाह उन्हें जनता ने ही सत्ता सौंपी थी। आपने जो उदाहरण दिए हैं उससे साफ है कि चाहने और डॉलर को पानी की तरह बहाने के बावजूद अमेरिका जनआंदोलनों को नहीं रोक सका और फिदेल कास्त्रो और ह्यूगो चावेझ जैसे तानाशाह सत्ता पर काबिज हो गए। यही लोकतंत्र की ताकत है कि जो जनता चाहेगी वही होगा। परेश जी आपने अपनी टिपण्णी में जिन अमेरिकी कंपनियों में घोटालों और अमेरिका के वित्तीय संकट का जिक्र किया है... हो सकता है कि वो 6 महीने या सालभर में दूर हो जाए। अमेरिकी जनता इसके दोषियों को सभा भी दे दे.. बुश की पार्टी को बाहर कर और बाराक ओबामा को राष्ट्रपति बनाकर या फिर किसी तीसरे.. चौथे को या पांचवें शख्स को... राष्ट्रपति बनाकर जो उन्हें संकट के दौर से निकाल सके। लेकिन लोकतंत्र के नाम पर सत्ता पर काबिज होने वाले तानाशाहों से जब लोग उब जाते हैं तो उनके पास कोई उपाय नहीं होता कि वो उससे छुटकारा पा सकें.. अगर ह्यूगो चावेझ कल को कहने लगें कि अमेरिका आ जाएगा इसलिए हम लोगों को चुनने का अधिकार नहीं देंगे तब लोगों के बीच से ही कोई विद्रोही गुट उभरेगा और जनता की लड़ाई लड़ने लगेगा.. उसे शायद अमेरिका से समर्थन भी मिलेगा तब आप जैसे लोग कहेंगे कि देखो अमेरिका कैसे विद्रोहियों की मदद कर रहा है और सर्वहारा वर्ग की क्रांति को कुचलने की कोशिश कर रहा है। ठीक वैसे ही जैसे नेपाल में राजशाही से लोगों का जी उब गया और उनके पास कोई रास्ता नहीं था राजा को हटाने का तब उन्हें माआवोदियों में आशा की किरण दिखी। अमेरिका और भारत के न चाहने के बावजूद माओवादी मजबूत होते गए। उन्हें एक मुल्क ने भारी मदद की जिसे मुझ से बेहतर आप जानते हैं। लेकिन आपने नेपाल में माओवादियों की हिंसा को क्रांति का चोला पहना दिया और मदद देने वाले देश की आपने भरपूर वकालत की। कल को अगर प्रचंड कहने लगें कि हम तो सर्वहारा वर्ग के प्रतिनिधि हैं और हमें नेपाल पर अनंतकाल तक राज करने का हक है तो फिर इतिहास अपने दुहराएगा।परेश भाई मैं कोई क्रांति का झंडाबादार नहीं हूं... मैं किसी के लिए झंडा नहीं उठाता... लेकिन जो झंठा उठाता है मुझे लगता है कि उसे इसका हक है... झंडा चाहे लाल हो या भगवा या फिर किसी तीसरे रंग का। जैसे आपको लाल झंडा उठाने का हक है ठीक वैसे ही उम्मीद करता हूं कि आप भी कम से कम दूसरों का हक तो नहीं मारेंगे। लेकिन आपके प्रगतिशील कम्यूनिस्टों ने बेचारे तिब्बतियों के साथ पश्चिम बंगाल में क्या किया.. शांतिपूर्ण तरीके से प्रदर्शन भी नहीं करने दिया.. मुझे तो शर्म आई थी उस दिन कि हम हिंदुस्तान में हैं...मैंने कहीं खबर पढ़ी थी थी कि तिब्बत में लाल झंडा के अलावा कोई दूसरे रंग का झंडा उठाता है तो उसे गोली मार दी जाती है। मैंने तिबब्त की आजादी के लिए कोई आंदोलन नहीं चला रहा और न मुझे कोई शौक है... लेकिन परेश भाई मैं तो सिर्फ इतना पूछना चाहता हूं कि क्या तिब्बतियों को पश्चिम बंगाल की सड़कों पर प्रदर्शन करने का अधिकार था कि नहीं... तसलीमा नसरीन को पश्चिम बंगाल में रहने का हक था कि नहीं...।जहां तक आप बुजुर्वा क्रांति की बात करते हैं.. जो सोवियत संघ से शुरू हुई थी। सोवियत क्रांति ने ही स्टालिन जैसे क्रांतिकारियों को जन्म दिया जो कभी हिटलर के साथी थे (आपके धुर विरोधी संघी.. हिटलर को अपना आदर्श मानते हैं जिनमें नरेंद्र मोदी भी शामिल हैं और चीन के महान कम्यूनिस्टों ने उनका चीन दौरे के दौरान शानदार स्वागत किया था) और उन्होंने कितने लोगों को क्रांति के नाम पर हत्याएं कराई किसी से छुपी नहीं है। हालांकि आप जैसे लोग स्टालिन युग को महान युग की संज्ञा देते हैं क्योंकि उस युग को सिर्फ रशियन लोगों ने सहा था और आपको उनके दर्दों से कुछ लेना देना नहीं। आप जिस सोवियत क्रांति की बात करते हैं शायद आपने पढ़ा हो 1964 की हंगरी की क्रांति या फिर 1979 की अफगानिस्तान की क्रांति..। जब सोवियत सेनाओं ने अफगानिस्तान पर कब्जा किया तो काश आप जैसे लोग सोवियत हमले के विरोध में एक शब्द भी बोले होते... ख्रुश्चेव को खरी-कोटी सुनाई होती.. तब आप अमेरिका के वहां घुसने का विरोध करते तब हमारे जैसे लोग भी आपका नैतिक समर्थन करते। लेकिन तब आप आप जैसे लोग काफी खुश हुए थे कि चलो एक और किला फतह कर लिया। ठीक उसी तरह से जैसे 1962 में भारत पर हुए चीनी हमले का कम्यूनिस्टों को जोरदार स्वागत किया था। आप जैसे लोग इस कड़वी सच्चाई को सुनते ही आग बबूला हो जाते हैं जैसे संघ के लोगों को बताया जाता है कि उन्होंने गांधी की हत्या करवाई थी। भाई परेश.. आपने सही कहा कि इतिहास 20-20 नहीं है लेकिन कम्यूनिस्म के उदभव और समागम को देखते हुए तो लगता है कि इसे 5-5 भी कहना गलत होगा। आप कहते हैं कि अमेरिका में अश्वेतों का सफाया करने का अभियान चल रहा है लेकिन शायद आप भी अखबार पढ़ते होंगे कि एक अश्वेत राष्ट्रपति बनने के दौर में सबसे आगे है। आप कहते हैं कि मैं (लोकतंत्र) पहले अपना पैबंद सील लूं... मेरा पैबंद तो सील जाएगा क्योंकि मुझे किसी ख़ास रंग के कपड़े और धागे की जरूरत नहीं है। मुझे कोई भी रंग मिल जाएगा चाहे वो लाल हो भगवा हो नीला हो हरा हो या काला या पीला मेरे पैंबद सिल जाएंगे। लेकिन आपका क्या होगा क्योंकि दुनिया में लाल धागों की कमी होती जा रही है। अमेरिका हो या भारत.. लोकतंत्र पैबंदों के सहारे ही चलता है लेकिन आप जिस सर्वहारा सोवितय क्रांति का जिक्र कर खुश हो जाते हैं वो भी पैबंद ही था जिसे लेनिन जैसे महान बुजुर्वा नेता ने लाल धागे से सील दिया। जब स्टालिन आए तो उन्होंने पैबंद को लाल रंग से रंग दिया। रंग की कमी पड़ने पर उन्होंने खून की नदियां बहाई और सारे पैबंद मिटाने के लिए लाल खून की मोटी परत चढ़ा दी। लेकिन पैबंद को लगातार सिलने की कोशिश करते रहे तो काफी समय तक चलता है... हो सकता है कि अनंत काल तक चले लेकिन सोवियत पैबंद का रंग फींका पड़ने लगा और आपको तो पता ही जब पैबंद फटा तो चिंदी-चिंदी उड़ गई। कम्यूनिस्ट ऐतिहासिक भूलों के लिए याद किए जाते हैं। पता नहीं आपको काल मार्क को पढ़ते कितने दिन हुए मुझे इंतजार होगा उस दिन का जिस दिन आप भी कहेंगे कि "वो ऐतिहासिक भूल थी - मेरा कम्यूनिस्ट होना" नाराज मत होइगा आपकी टिपण्णी पढ़ी थी तो लगा था कि आप बहुत गुस्से में हैं... लेकिन हम हिंदुस्तान में हैं चीन में नहीं.. और इस देश में कुछ राज्यों को छोड़कर पश्चिम बंगाल और केरल (जहां सबसे पहले Da Vinci Code फिल्म पर सबसे पहले प्रतिबंध लगाई गई थी) को छोड़कर बाकी राज्य ठीक हैं। जहां कमोबेश लोगों को अपनी बात रखने का हक है। कम से कम सरकारें तो ऐसा नहीं करतीं। आज बहुत हो गया बाकी फिर कभी...।

देवेंद्र वर्मा (18 सितंबर, 2008. 1215am)


वर्मा जी आपके सामने सचाई क्या बयान की आप उसे हमारा गुस्सा कह खारीज करने लगे। भाई आप मैंरे प्रश्नो का जवाब देने के स्थान पर पुन: वो ही बाबा आदम के जमाने की कम्युनिस्ट विरोधी थ्योरी झाडने लगे। जब से मैंने होश संभाला तभी से आपके द्वारा पेश दलीले सुनता आया हू। आपका संभावित अमेंरीकी अश्वेत राष्ट्रपति अभी चुनाव जीत नहीं गया है, जीत भी जाये तो क्या। देखिये एक या दो आदमीयो को उच्च से उच्चतम पोस्ट पर पहुचाकर अमेंरीका अपनी हिस्ट्रीशीट साफ करने का प्रयास कर रहा है। एक बराक के जीत जाने से 4 दशक पूर्व तक अश्वेतो से किये भेदभाव समाप्त नहीं हो जाने वाले, लूथर किंग को भूल गये क्या आप? याद रखे हमारे देश में कलाम साहब को राष्ट्रपति मुस्लिम विरोध पर टिकी राजनीती ने ही बनाया, इसका ये मतलब तो नहीं की हिन्दूत्व का राग अलापने वाली भाजपा को अचानक मुस्लीम प्रेम उमड आया हो। चावेझ तो इक्का दुक्का रेफेरेन्डमस को छोड हमेंशा आधी से भी अधिक जनता के विश्वास से जीतते आये है, उधर आपके हार चुके आका बुश पहली दफा अदालत के फैसले के दम पर राष्ट्रपति बने थे। खैर आपको यहा क्वोट कर रहा हू - "आप जिन लैटिन अमेरिकी देशों की बात कर रहे हैं.. वहां के तानाशाह लोकतंत्र के जरिये ही सत्ता पर काबिज हुए हैं। ठीक उसी तरह से जैसे अमेरिका में या फिर भारत में कोई पार्टी सत्ता संभालती है। ह्यूगो चावेझ हो या फिर कोई और लैटिन अमेरिकी देश के तानाशाह उन्हें जनता ने ही सत्ता सौंपी थी।" माफ किजीये शायद मैं कुछ ठीक से समझ नहीं पा रहा हू आपकी दलील के दो मायने निकाले जा रहे है - 1. भारत अमेंरीका ब्रिटेन व अन्यत्र कही कोई पार्टी लोकतंत्र के जरीये सत्ता में आये तो तानाशाह नहीं है पर तीसरी दुनिया के देशो में कही भी लोकतंत्र के जरीये कम्युनिस्ट शासन में आये तो वो तानाशाह, आपकी दलील तारीफे काबिल है। अथवा 2. आप ये तो नहीं कहना चाहते की अमेंरिका व भारत के राष्ट्राध्यक्ष भी लैटिन अमेंरिका के वामपंथी गठबंधनो के नेता की तरह तानाशाह होते है जिन्हें जनता चुन लेती है। आपकी उपरोक्त दलील से मुझे किंसीगर का कुख्यात बयान या आ गया जिसमें वे कहते है - "मुझे समझ नहीं आता हम क्यो हाथ पर हाथ धरे बैठकर एक देश का उसकी जनता के गैरजिम्मेदाराना रवैये के चलते कम्युनिस्ट (वामपंथी) होता देखे।"मैं पुन: आपको क्वोट कर रहा हू - "लोगों के बीच से ही कोई विद्रोही गुट उभरेगा और जनता की लड़ाई लड़ने लगेगा.. उसे शायद अमेरिका से समर्थन भी मिलेगा तब आप जैसे लोग कहेंगे कि देखो अमेरिका कैसे विद्रोहियों की मदद कर रहा है और सर्वहारा वर्ग की क्रांति को कुचलने की कोशिश कर रहा है। ठीक वैसे ही जैसे नेपाल में राजशाही से लोगों का जी उब गया और उनके पास कोई रास्ता नहीं था राजा को हटाने का तब उन्हें माआवोदियों में आशा की किरण दिखी।" आप पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद, खालिस्तान आंदोलन, नार्थ इस्ट की अलगाववादी विघटनकारी शक्तियों के विषय में क्या कहना चाहेंगे? क्या आप अपने तर्क से इन सभी विदेशी मदत प्राप्त विघटनकारी अलगाववादी ताकतो की करनी को जस्टीफाय नहीं कर रहे है? लैटिन अमेंरीका के देशो में पिछले 4-5 दशक में तानाशाहो को स्थापित करने के लिये अमेंरीका ने खूनी खेल खेला उसकी तुलना नेपाल से नहीं कर सकते है। नेपाल के बारे में आपकी जानकारी दुरूस्त नहीं है, नेपाल से राजशाही की विदाई में माआवोदियों के साथ अन्य सात दल भी बराबरी के हिस्सेदार रहें है जिसमें नेपाली काग्रेस व सीपीएन यूएमएल जैसे दल भी शामिल थे। प्रचंड नेपाली लोकतंत्र के नही अपितू संविधान सभा के प्रधानमंत्री चुने गये है, वो भी जनता द्वारा चुने प्रतिनिधीयो द्वारा। माआेवादियो के मुख्यधारा में लाने में चीन से ज्यादा भूमिका भारत की रही हैं। ये हमारी उपलब्धि है कि हमारे गाइडेन्स में हमारा प्रमुख पडोसी हिन्दू राजशाही को विदा कर नये दौर में शामिल हुवा है व आज अपना संविधान बना रहा है। इसमें दुखी होने वाली क्या बात है? मैं आपको क्वोट कर रहा हू - "मैंने कहीं खबर पढ़ी थी कि तिब्बत में लाल झंडा के अलावा कोई दूसरे रंग का झंडा उठाता है तो उसे गोली मार दी जाती है।" वर्मा जी आप कही की पढी पढाई बात को वास्तविकता मान लेते है? कुछ दिनो पूर्व मैंने कही पढा आपने भी जरूर ही पढा होगा कि 9/10 को दुनिया खत्म होने वाली है, आदरणीय आज 9/18 हैं। आप बंगाल में तिब्बती आंदोलनकारीयो को रोकने की बात कह रहें है वो आेलम्पिक टार्च के विरोध में प्रदर्शन करना चाहते थे, ये लोग कहा से आये क्या चाहते थे, इनका दार्जलिंग में अनरेस्ट से क्या लेना देना था? ये पता करके आये फिर बहस करे। वैसे भी आेलम्पिक टार्च का विरोध पूरे विश्व व आेलम्पिक का अपमान करना है, क्या आप आेलम्पिक को विरोध का हथियार बनाने दे सकते है। ग्रीस ने भी उसी दौरान तिब्बती प्रदर्शनकारियो की गतिविधीयो पर प्रतिबंध लगा दिया था आप ग्रीस के बारे में क्या कहेंगे। याद रखिये तिब्बती विद्रोही भारत का इस्तेमाल चीन के खिलाफ कर रहे है ठीक उसी तरह जिस तरह काश्मीर अलगाववादियो का पाक। जिस स्टालिन ने स्टालिनग्राद में हिटलर को धुल चटवायी, नाजीयो को यूरोप में घुसने से रोका उसे आप हिटलर का साथी कहते है। संधिया तो अमेंरीका रूस, अमेंरीका चीन, चीन भारत, भारत पाक के बीच भी होती आयी है, इसका मतलब ये तो नहीं की इनके राष्ट्राध्यक्ष एक दुसरे के मित्र हो। स्टालिन-हिटलर अथवा बुद्धदेब-मोदि में कही कोई तुलना हो ही नहीं सकती है। खैर स्टालिन के बारे में जानना हो तो हरपाल बराड की सोवियत संघ का पतन जरूर पढे। अफगान में सोवियत सेना कब्जा जमाने नहीं गयी थी अपितु अफगानि राष्ट्रपति के आग्रह पर अमेंरिका प्रायोजित मुजाहिदिन आतंकवादीयो से निपटने गयी थी। सोवियत्स के पराभव के बाद अफगान का क्या हश्र हुवा ये तो आप जानते ही है। ख्रुश्चेव के बारे में आप क्या जानते है? कोई भी लिबरल लेफ्टीस्ट उनको डिफेंड नहीं करना चाहेंगा। लेकिन हम अफगान मामले के लिये ख्रुश्चेव पर दोषारोपण करते हुवे इसे अफगान हडपने का साम्राज्यवादी युद्व नहीं मानते। तसलीमा नसरीन को पश्चिम बंगाल में रहने का हक था कि नहीं...। बिल्कुल है। तसलीमा पर हमलो का वामपंथियो ने हमेंशा विरोध किया। कलकत्ता में तसलीमा के नाम पर दंगा करने वाले टीसी से संबंध मानोरिटी फोरम के नेता व उसके पठ्ठो का क्या हश्र किया गया ये भी पता लगाये। तसलीमा अपनी मर्जी से जयपुर गयी थी बंगाल सरकार ने उसे नहीं भेजा। वैसे भी ये मुद्दा राज्य सरकार से ज्यादा कैंद्र के पाले में ज्यादा है। आपसे आग्रह है कि http://www.pragoti.org/node/392 को जरूर पढे, तसलीमा व Da Vinci Code के संबंध में आपको अपने सभी सवालों का जवाब मिल जायेगा। लेनिन को बुर्जआ उनके दुश्मन तक नहीं कहते हैं, अगर लेनिन सर्वहारा के झंडाबरदार न होकर बुर्जआ नेता थे तो गाली देने के स्थान पर तर्क देकर सिद्ध करें। आप उस लेनिन का अपमान कर रहें है जिनके जीवन से भारत के प्रथम कम्युनिस्टो मैंसे एक व महान क्रांतिकारी व भगतसिंह अपनी मृत्यु तक प्रेरणा लेते रहें। लाल झंडा थामे हुए दुनिया की हर समस्या के लिए अमेरिका को कोसना तो कम्यूनिज्म का शगल है। इस टिप्पणी से हम सहमत नहीं है, हमारी असली लडाई तो पूंजीवाद साम्राज्यवाद गरीबी भुखमरी सांप्रदायिकता फासीवाद से है। हम उन लोगो मैंसे नहीं है जो चीन व पाकिस्तान की जनता के साथ दुश्मनीभरा व्यवहार रखे। किसी देश की नितीयो के विरोध का मतलब उस देश की जनता के विरोध से नहीं लगाया जा सकता। आपके द्वारा तानाशाह निरूपित हूगो चावेझ का देश अमेंरीका के तटीय इलाकों में तूफान पिडीतो की मदत के लिये अमेंरिकी सरकार से पहले पहुचा, उधर आपके महान बुश सैर सपाटा करते फिर रहे थे। बहरहाल आपके प्रिय न्यायप्रिय लब की आजादी वाले लोकतंत्र अमेंरिका ने महानता का परिचय देते हुवे चीली की मुर्ख जनता द्वारा जिताये गये खूनी तानाशाह अलेन्दे व उनके परम मित्र चाटुकार क्रूर कवि पाब्लो नेरूदा को मारकर शांति के महान मसीहा लोकतंत्र के रखवाले पिनोशे को सत्ता दिलवायी। अब आप लूला डिसल्वा, मिशेल बचलेट, क्रिस्टीना किरशनेर, ईवो, चावेझ, लूगो, प्रचंड को बर्बर तानाशाह कहना चाहे तो कहें बुश पिनोशे हिटलर की जिंदाबाद करना चाहे तो करे आपको अपने विचारों पर बने रहने का पूरा अधिकार है। लेकिन, हम जैसे कमीने विधर्मी देशद्रोही गौमांस खाने वाले कम्युनिस्ट जब तक यहा लब की आजादी है तब तक लेनिन स्टालिन अलेन्दे चावेझ फिदेल प्रचंड जिंदाबाद करते रहेंगे। खैर बोल, कि लब आज़ाद हैं तेरे, बोल, ज़बां अब तक तेरी है!

परेश टोकेकर 'कबीरा ' (18 सितंबर, 2008. 1158am)

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