9/11 लोकतंत्र की हत्या के अमेरिकी अभियानों की प्रतीक बन चुकी तारीख़
9/11. यह तारीख अमेरिका की लोकतंत्रविरोधी करतूतों का प्रतीक बन चुकी है। डब्ल्यूटीओ पर हमले की बात भर नहीं है (हालांकि यह भी अमेरिका द्वारा दुनिया में हिंसा के सहारे लोकतंत्र और स्वतंत्र सरकारों को कुचलने के लिए पैदा किए गए आतंकवाद का ही नतीजा थी। इसके बाद आतंकवाद से लड़ने के नाम पर अमेरिका ने जो घिनौने अभियान छेड़े, वो भी सामने हैं)। हम जरा पीछे जाना चाहेंगे, जब अमेरिका के पास आतंकवाद से झूठी लड़ाई का बहाना भी नहीं था। तब ११ सितंबर १९७३ को अमेरिका ने चिली की लोकप्रिय सरकार का तख्ता पलटकर वहां सैनिक तानाशाह को गद्दीनशीं किया था। चिली में अमेरिका के इशारे पर सल्वादोर अलेंदे का तख्ता पलटने के लिए दक्षिणपंथी फासिस्ट सैनिक धड़े ने मजदूरों, राजनैतक कार्यकर्ताओं और आम लोगों का बड़े पैमाने पर कत्लेआम किया था। अलेंदे बाकायदा चुनाव जीतकर सत्ता में आए थे और यह अमेरिका को रास नहीं आ रहा था कि जनता के लिए प्रतिबद्ध क्रांतिकारी विचारों वाली सरकार इस तरह व्यापक जनसमर्थन के साथ सत्ता में आए। इस शांतिपूर्ण औऱ लोकतांत्रिक क्रांति को दुनियाभर ने सलाम किया था और यही बात अमेरिका को खतरे की घंटी लगी थी। तमाम आर्थिक साजिशों के बावजूद अलेंदे डटे रहे तो सीआईए ने सीधा हस्तक्षेप कर लोकतंत्र की हत्या को अंजाम दिया। यह बात अलग है कि अलेंदे आज भी दुनिया भर में लोकतंत्र और क्रांतिकारी प्रतिबद्धता की मिसाल के तौर पर जीवित हैं।
मूल पोस्ट (मंगलवार, 9 सितंबर, 2008 0542 pm)
'हमेशा यूं ही उलझती रही है ज़ुल्म से ख़ल्कन उनकी हार नई है, न अपनी जीत नई'
डॉ अमर ज्योति (10 सितंबर, 2008. 0954 pm)
अच्छा..........।
शायदा (10 सितंबर, 2008. 1123 pm)
अच्छा आलेख!!
उड़न तश्तरी (11 सितंबर, 2008. 0113 pm)
तुम्हारी बात में दम है। आतंकवाद मिटने के नाम पर उससे भी बड़ा आतंकवाद खड़ा कर दिया जाता है। ऐसी तार्किक बातें हिन्दी ब्लॉग जगत में गिने चुने लोग ही करते हैं। गत १ जनवरी को उदय प्रकाश जी ने आतंकवाद के मुद्दे पर जबरदस्त पोस्ट लिखी थी- सदमे का सिद्धांत। उस पोस्ट का लिंक है- http://uday-prakash.blogspot.com/2008/01/blog-post.html
अरुण आदित्य (11 सितंबर, 2008. 0158 pm)
सैणी साब, एक छोटा सा सवाल.... क्या तुम थ्येनमान चौक पर लोकतंत्र की मांग का नेतृत्व करने वाले युवक का नाम जानते हो.... क्या तुमने कभी उनके लिए शोक व्यक्त किया है... अच्छा होगा कि तिब्बतियों के बारे में तो लिखें....
सोतड़ू (11 सितंबर, 2008. 0514 pm)
बढ़िया है धीरेश भाई! महत्वपूर्ण और तार्किक पोस्ट!
अशोक पांडे (12 सितंबर, 2008. 0152 pm)
सोतडू साहब संसद पर आतंकवादीयो के हमले को भारत ने कितनी देर बर्दाश्त किया? भाई आपके लोकतंत्र समर्थक नौजवान जिसे टैंक मैंन नाम से जाना जाता है, के बारे में उसकी तस्वीर उतारने वाले फोटोग्राफर कोल का क्या बयान है उसे बताने का कष्ट करेंगे आप? भाई मौते किसी की भी हो हम उसे दुखद मानते है, थ्येनमान चौक पर जो कुछ भी हुआ दुखद था। हम कम्युनिस्ट सच्चे मानवतावादी है आप हमें किसी इराकी, विएतनामी, अफगानी की मौत पर जश्न बनाते कभी न पावोगे। भारत के प्रथम कम्युनिस्टो मैंसे एक भगतसिंह भी हिंसा को अनुचित मानते थे उन्हें मानव हत्या करने का मलाल भी था। दूसरी तरफ साम्राज्यवादी अमेंरिका का शासक वर्ग व उसके नकचढे सैनिक है जिन्हें लोगो को तडपा तडपाकर मारने में मजा आता है। खैर किस तिब्बत की आजादी की बात कर रहे है आप? उस तिब्बत की जिसके लिये स्वशासन से अधिक दलाई लामा तक ने कभी न चाहा। सोतडू जी चीन या अन्य साम्यवादी देश ने किस तीसरी दुनिया की देश को अपना उपनिवेश बनाया, किस देश के संसाधनो को लूटा बता सकते है आप?सीमा विवादो को छोड चीन को कभी दुसरे देशो में साम्यवाद आयात करते देखा आपने? उधर साम्राज्यवादी अमेंरिका लोकतंत्र आयात करने के नाम पर इराक अफगान यूगोस्लाविया न जाने कहा कहा कब्जा जमाये बैठा है गरीब देशो के संसाधनो का सरेआम लूट रहा है। इसे आप क्या कहेंगे?बहरहाल हमारे देश में कम्युनिस्टो पर लोकतंत्र विरोधी का लेबल चस्पा करने की पुरानी रवायत रही है, लेकिन सचाई इसके उलटे है। अभी पिछले महिने सभी दल संसद में बैठ अपनी मा बहन पत्नी भाभी समान देश का सौदा कर चीरहरण करवा रहे थे उधर ये वामपंथी कृष्ण ही थे जो मा बहन पत्नी भाभी समान देश की लाज बचा रहे थे। इस बारे में आपका क्या कहना है आदरणीय सोतडू जी? धीरेश भाई बहुत बढीया पोस्ट है, मैं पिछले कई वर्षो से इस विषय पर जानकारी एकत्र कर रहा हू। भाई अलेन्दे उसके बाद नेरूदा की मौत को भुला नहीं जा सकता है, ये लोकतंत्र समर्थक अमेंरीका का असली चेहरा है।
परेश टोकेकर 'कबीरा ' (12 सितंबर, 2008. 1120 pm)
भाई परेश जैसा कि तुम्हारा नाम है तुम हर आते-जाते को टोके करो। विनोद दुआ ने एक बार कहा था कि लाल और भगवे वाले ख़ुद को हमेशा बाकियों से नैतिक रूप से एक स्टेप ऊपर समझते हैं- तुम तो इसकी घोषणा भी करते हो। तमीज की बात क्या लाल झंडे के बाहर रहकर नहीं हो सकती ? ये तो तुम लोगों ने महान होने का शॉर्टकट बना लिया है। चूंकि धीरेश सैनी कोई झंडा उठाकर नहीं चलते हैं, क्योंकि धीरेश सैनी की बात की मैं बहुत इज़्ज़त करता हूं, क्योंकि मैं कोई झंडा लेकर नहीं चल रहा और ये नही चाहता कि धीरेश सैनी उसके तले आए... इसलिए मैं उनसे बात करना चाहता हूं....बस इतना ही। सोतड़ू (14 सितंबर, 2008. 0238 pm)
आदरणीय सोतडू जी,माफ किजीये मैं आपको तमीज नही सिखा रहा हू, लेकिन लोगो के उपनाम से उनके कर्म-धर्म-जातपात का पता लगाने का प्रपंच कम से कम अब छोडे। हम तो किसी इश्वर या उसके कमबख्त धर्म को ही नहीं मानते है कम से कम इस चु..पे से हमें बख्शे। हमें उपनाम नाम से जितनी गाली दे ले कोई फरक नहीं पडने वाला लेकिन गलती से किसी भगवाई चोटीवाले या ढाडीवाले मिया के उपनाम का उपहास करने का दु:साहस न कर बैठियेगा एसा करने का क्या हश्र होगा इतना तो आप भी जानते ही है। हा-हा-हा!कोई किसी से भी बात करना चाहे इससे हमे क्या। आप भले ही हमसे असहमत हो लेकिन अपने विचार यहा रखने का अधिकार तो हमें भी हैं।भाई कुछ भी कहे लाल झंडे वाले बाकी सबसे नैतिक रूप से एक स्टेप उपर ही होते है। कौनसा वामपंथी सांसद स्टींग आपरेशन में आज तक पकडा गया? संसद में आज तक कितने वामपंथी सांसद है जिन्होने पैसा लेकर जमीर की आवाज सुनी? भाई हमें महान होने का कोई भी शौक नहीं है, भगतसिंह, पाश, सफदर हाशमी व लाखो कम्युनिस्टो ने सिर्फ महान होने की खातिर बलिदान नहीं दिया। इन शहीदो ने अपने विचारो की खातिर उच्च कम्युनिस्ट नैतिकता का परिचय देते हुवे अपना सर्वस्व त्याग किया है, कृपया करके इसे महानता की लालसा कह कर गाली न दे।सोतडू जी मैरा आपसे नम्र निवेदन है कि अन्यथा न ले, आपको जरूर कही कुछ गलतफहमी हुवी है, हमने कही किसी को तमीज सिखाने की कोशिश नहीं की है। लेकिन आप मैंरे उठाये प्रश्नो का जवाब देने के स्थान पर बहस से बच रहे है ये मेरी आपत्ति हैं। कृपया करके बहस में लौट आये व मैरे उठाये प्रश्नो का जवाब देकर उपक्रत करे।
परेश टोकेकर 'कबीरा ' (14 सितंबर, 2008. 0542 pm)
परेश जी, टोके-कर वाली बात के लिए मैं माफ़ी चाहता हूं- ग़लती तो हो गई है। हां एक बात मैं फिर दोहराना चाहूंगा कि चूंकि धीरेश का कहा मेरे लिए महत्वपूर्ण है, इसलिए ही मैंने टिप्पणी की थी। बहस शुरू करने या करने का मेरा कोई इरादा नहीं, दरअसल स्वभाव ही नहीं। फिर मैं ऐसे लोगों से बहस करना पसंद नहीं करता जिनकी राय पहले के कायम है। मैं आपकी बात काटने के लिए तर्क लेकर आऊंगा, फिर आप लेकर आएंगे...हो सकता है कि इसमें मज़ा आए, हो सकता है कि मेरी राय भी बने-बदले। लेकिन इसमें वक्त लगेगा- जो सचमुच मेरे पास नहीं है। फिर राय उसी के कहे से बदलेगी जिसकी बात की आप कद्र करते हों- वो आदमी धीरेश है फ़िलहाल। आपको पढ़ता रहूंगा। फिर मुझे ये भी लगता है कि ब्लॉग एक कोना हैं। या तो इसमें एक ही विचार के लोग इकट्ठे होते हैं और एक-दूसरे को कहते हैं कि- भई वाह, क्या खूब लिखा। या फिर कभी-कभी लोग ख़िलाफ़ विचार को गाली देने भी आ जाते हैं। ऐसे में मुझे लगता है कि अगर आप ईमानदारी से तटस्थता के साथ राय दे सकें तो काफ़ी है। धीरेश के ब्लॉग पर मैं यही करने की कोशिश कर रहा हूं। भूल-चूक लेणी देणी
सोतड़ू (14 सितंबर, 2008. 1049 pm)
सोतडू जी, टोके-कर वाली बात करके आपने हमें अपना बना लिया, सभी मित्र बचपन से मुझे टोक या कडी कहकर चिढाते आये है उनको वो ही जवाब हमेंशा मिलता आया जो आपको मिला। बचपन की बात कुछ आेर थी तब मैं कडी कहने पर अथवा टोके कहने पर खुब चिढता था पर अब एसा नहीं हैं। टोके-कर वाले मामले में मैंरे जवाब से आप आहत हुवे इसके लिये माफी चाहता हू। सोतडू जी आपसे आग्रह है कृपया करके माफी मांग कर शर्मिदा न करे। आपकी राय को स्वीकार करने की कोशिश करूंगा व आपके तर्क का इंतजार रहेंगा।
परेश टोकेकर 'कबीरा ' (15 सितंबर, 2008. 1231 pm)
3 comments:
अच्छा लिखा है. आपका स्वागत है.
आपका चिठ्ठा जगत में स्वागत है निरंतरता की चाहत है
बधाई स्वीकारें मेरे ब्लॉग पर भी पधारें
बहस पर बहस
Post a Comment