ये बात कुछ जमी नहीं देवेंद्र जी...कि 'ज़माने से कदमताल'भी करेंगे और बोहनी के लिए इंतज़ार भी करेंगे...के.कामराज ने अपनी कहानी में एक जगह लिखा है कि वे स्कूल में अक्सर पिछड़ जाते थे...एक बार कोई प्रसाद बांट रहा था और कामराज आगे बढ़कर हाथ नहीं फैला सके...घर लौटे तो दादी ने कहा- प्रसाद नहीं लाए?...इसपर कामराज रो पड़े...बोले कि मैं ऐसे आगे बढ़कर कुछ नहीं ले पाता...खैर कामराज के ज़माने में अच्छे लोग थे...उनकी पहचान हुई...उन्हें आगे बढ़ाने वाले नेक लोग मिले...अब नहीं मिलते...आप बोहनी के लिए बोली तो लगाइए...कई आएंगे...और हम जानते हैं कि आपके पास बेहतरीन चीज़ें हैं...दुकान पर खाली हाथ मत बैठिए...हम कल फिर आएंगे..कुछ मिलना चाहिए।
2 comments:
बोहनी ब्लॉग पर बोला जानेवाला अहम शब्द भी बन जाएगा। धीरेश सैनी के ब्लॉग पर टिप्पणी बहुत अच्छी थी, इसे तो पोस्ट के रूप में भी डाला जा सकता था।
ये बात कुछ जमी नहीं देवेंद्र जी...कि 'ज़माने से कदमताल'भी करेंगे और बोहनी के लिए इंतज़ार भी करेंगे...के.कामराज ने अपनी कहानी में एक जगह लिखा है कि वे स्कूल में अक्सर पिछड़ जाते थे...एक बार कोई प्रसाद बांट रहा था और कामराज आगे बढ़कर हाथ नहीं फैला सके...घर लौटे तो दादी ने कहा- प्रसाद नहीं लाए?...इसपर कामराज रो पड़े...बोले कि मैं ऐसे आगे बढ़कर कुछ नहीं ले पाता...खैर कामराज के ज़माने में अच्छे लोग थे...उनकी पहचान हुई...उन्हें आगे बढ़ाने वाले नेक लोग मिले...अब नहीं मिलते...आप बोहनी के लिए बोली तो लगाइए...कई आएंगे...और हम जानते हैं कि आपके पास बेहतरीन चीज़ें हैं...दुकान पर खाली हाथ मत बैठिए...हम कल फिर आएंगे..कुछ मिलना चाहिए।
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